गैरसेंण राजधानी बना कर प्रायश्चित करें उत्तराखण्डी नेता


अगर प्रदेश के नेताओं को जरा भी शर्म व लोकशाही के प्रति श्रद्धा रहती तो वे 2000 में ही स्थाई राजधानी गैरसेंण घोषित करके यह आयोग बनाते कि गैरसेंण में कितनी जल्दी राजधानी बने परन्तु यहां तो सन 2000 से 2012 तक ऐसे जनविरोधी नेता सत्ता में काबिज रहे जो जन भावनाओं का गला घोंटते हुए राजधानी बलात देहरादून में ही थोपने का षडयंत्र करते रहे। लोकतंत्र में आयोग नहीं जनभावनायें सबसे महत्वपूर्ण होती है। जो राजधानी चयन आयोग ही प्रदेश की जनभावनाओं को रौंदने के लिए बनाया गया था। ऐसे आयोगों को बनाने वालों को जब उत्तराखण्ड राज्य गठन व राजधानी गैरसेंण बनाओं का 1994 से 2000 तक चला व्यापक जनांदोलन ही नहीं दिखायी दिया तो उनसे क्या आशा की जा सकती है। अब देर सबेर चाहे किसी भी भाव से वर्तमान सरकार ने गैरसैंण में विधानसभा भवन बनाने व शिलान्यास करने का ऐतिहासिक काम किया है। यह गैरसेंण राजधानी बनाने के लिए मील का पत्थर उसी प्रकार से होगा जिस प्रकार से पूर्व प्रधानमंत्री देवगोडा जी ने 15 अगस्त के दिन उत्तराखण्ड राज्य गठन करने का राष्ट्रीय संकल्प लिया था। प्रदेश की राजधानी गैरसेंण बनाने के बजाय देहरादून में थोपे रखने का काम करने में लिप्त रहे तिवारी, खण्डूडी व निशंक जैसे मुख्यमंत्रियों के लिए यही अब सबसे उत्तम होगा कि वे गैरसैंण राजधानी बनाने के लिए सरकार पर दवाब बना कर अपना प्रायश्चित करें। शायद इस कार्य से भगवान बदरीनाथ उनके उत्तराखण्ड विरोधी कृत्य को माफ कर दें।

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