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Sunday, July 22, 2012


-उत्तराखण्ड के हुक्मरानों को बेनकाब करता है मुख्यमंत्री बहुगुणा व गणेष गोदियाल प्रकरण 

-12 साल में लोकषाही का पहला पाठ भी नहीं सीख पाये उत्तराखण्ड के हुक्मरान
बेषाखियों के सहारे चल रही कांग्रेस नेतृत्व वाली उत्तराखण्ड सरकार के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा से जहां कांग्रेसी विधायक नरेन्द्र गोदियाल की आहत होने की खबरे आज कल कांग्रेसी नेताओं की ही नहीं अपितु प्रदेष के राजनीति के मर्मज्ञों के बीच चर्चा का विशय बनी हुई है। वहीं दूसरी तरफ कफकोट के कांग्रेसी विधायक ललित फर्सवाण भी इन दिनों नाखुष हैं। सुत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री विजय और विधायक गणेष गोदियाल के बीच इस तनातनी का मूल कारण पौड़ी जनपद के जिलाििधकारी द्वारा जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा से आहत गणेष गोदियाल जब मुख्यमंत्री के दरवार में अपनी फरियाद सुनाने गये तो उनको अपने मुख्यमंत्री द्वारा जो जवाब मिला उससे गणेष गोदियाल काफी आहत हैं। अखबारों में छन कर आ रही खबरों के अनुसार प्रदेष के क्षत्रप इस विवाद को सुलझाने में लगे हुए है। गणेष गोदियाल कितने आहत हैं इसका अहसास उनके अखबारों में प्रकाषित इन बयानों से ही लगाया जा सकता है कि ‘पद के हिसाब से चाहे कोई कहीं भी बैठा हो, सभी का मान-सम्मान रखना चाहिए।’। इन बयानों से साफ झलकता है कि मुख्यमंत्री के व्यवहार से कहीं न कहीं उनकी भावनायें आहत हुई है। एक विधायक या मंत्री नौकरषाही द्वारा खुद की उपेक्षा की षिकायत आखिर मुख्यमंत्री से नहीं करेगा तो किससे करेगा। परन्तु विजय बहुगुणा को भले ही कांग्रेसी आला नेता सोनिया गांधी व उनके आत्मघाती सलाहकारों ने मुख्यमंत्री बना दिया हो परन्तु मुख्यमंत्री बनने के बाद विजय बहुगुणा अपने व्यवहार में लोकषाही के इस गरीमामय पद के अनुसार तब्दीली नहीं कर पाये। गौरतलब है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके विरोध में मोर्चा खोले हुए कांग्रेसी नेता के आवास पर गये तो वहां पर पंहुच कर मुख्यमंत्री ने जो फटकार वहां पर बेठे विधायकों व समर्थकों को अपने मुख्यमंत्रित्व की हनक दिखाने की कोषिष की तो उनको वहां पर उनको जो लोकषाही का करारा जवाब किसी स्वाभिमानी नेता ने दिया, उस पर भले ही मीडिया ने पर्दा डाल दिया हो पर मुख्यमंत्री के दिलों व दिमाग में उस जवाब की गूंज लम्बे समय तक गूंजेगी।
यहां पर सवाल केवल मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा का ही नहीं अपितु प्रदेष के तमाम राजनेताओ ंका भी है जो लोकषाही में जनप्रतिनिधी बन कर जनसेवा के बजाय अपनी अंधी सत्तालोलुपता के लिए प्रदेष की लोकषाही को हांकते है। आज प्रदेष बनने के बाद यहां के अधिकांष जनप्रतिनिधियों की सम्पति में इन 12 साल में हुए इजाफा का अगर निश्पक्ष जांच हो तो इनके जनसेवा का असली चेहरा सामने आ जायेगा। मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों व विधायकों को नहीं नहीं नौकरषाहों को जनता के विकास के संसाधनों को अपनी मौज मस्ती, अपने प्यादों को लुटाने या अपनी छवि को संवारने के लिए पार्टियों, नाहक के कार्यक्रमों या अनावष्यक सैर सपाटे में बर्बाद नहीं करना चाहिए। प्रदेष को कभी अपनी जागीर समझ कर दागदार व आला नेताओं के प्यादों को महत्वपूर्ण पदों में आसीन करके व्यवस्था को बर्बाद नहीं करना चाहिए। पर सच्चाई यह है कि उत्तराखण्ड की अब तक की तमाम सरकारों व जनप्रतिनिधियों ने कभी न तो उत्तराखण्ड के आत्मसम्मान को रौंदने वाले गुनाहगारों र्को इंमानदारी से दण्डित करने का काम कर पाये व नहीं जनांकांक्षाओं के अनुसार प्रदेष के हितों की ही रक्षा कर पाये। प्रदेष के हुक्मरानों व नजप्रतिनिधियों को गली मुहल्ले में कागचों में बनी संस्थाओं के स्वयंभू आकाओं के दिषाहीन पदाधिकारियों की तरह प्रतिभाओं की उपेक्षा कर अपने प्यादों को गणेष बनाने की प्रवृति से उपर उठना होगा। जिससे लोग यह कहने से बचें कि अंधे बांटे रेवड़ी अपने अपने दे।
लोकषाही का पहला पाठ ही जनप्रतिनिधियों के लिए यही होता है कि वे खुद को जनसेवक व जनता को स्वामी समझे। जनप्रतिनिधियों को इस बात का भी अहसास रहना चाहिए कि लोकषाही में जनप्रतिनिधी को जनभावनाओं का सम्मान करना चाहिए। लोकषाही में मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद या प्रधानमंत्री आदि जो भी महान पद हैं उन पर आसीन लोगों को समझना चाहिए कि यह पद उनकी सत्तालोलुपुता की अंधी पूर्तिे के लिए नहीं अपितु जनभावनाओं का सम्मान करते हुए जनता के विकास करने के लिए मिला हुआ है। भले ही उत्तराखण्ड राज्य गठन हुए 12 साल गुजर गये परन्तु आज भी यहां के हुक्मरानों नेे लोकषाही के अनुरूप प्रदेष के षासन प्रषासन की दिषा तय करना तो रही दूर की गात वे खुद ही अपने आप को लोकषाही के अनुकुल नहीं ढाल पायें हैं। जनव्यवहार में आम जनता को ही नहीं अपितु सत्तारूढ़ पार्टी के विधायक व मंत्रियों को ही इनके अलौकषाही प्रवृति की घोर षिकायत रही। मुख्यमंत्री के पद पर आसीन व्यक्ति न जाने कैसे भूल जाता कि वह जनप्रतिनिधी व जनसेवक है न की मालिक। प्रदेष के लोगों को तिवारी व निषंक की कार्य प्रणाली से भले ही अनैक षिकायतें रही हों परन्तु उनके आम जनता से लोकषाही के अनुकुल व्यवहार से किसी को षिकायत नहीं थी। वहीं बहुत कम समय मुख्यमंत्री रहे नित्यानन्द व कोष्यारी का व्यवहार भी लोकषाही के अनरूप ही रहा। परन्तु भुवन चंद खण्डूडी व विजय बहुगुणा का व्यवहार से आम जनता ही नहीं अपितु विधायक भी आहत रहे। जहां तक मुख्यमंत्री खण्डूडी के खिलाफ उनके इस जनरली हनक को दिखाने के खिलाफ खुद उनके दल के विधायक व कई मत्रियों ने दिल्ली स्थित भाजपा आला नेतृत्व के समक्ष दिल्ली आ कर फरियाद तक कर डाली। अब भाजपा के आंखों के तारे खण्डूरी सरकार को सत्ता से बेदखल करने के बाद जनता उस समय ठगी सी रह गयी जब कांग्रेसी मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के व्यवहार से कांग्रेसी विधायक के आहत होने की खबरें चर्चाओं में है। सच्चाई क्या हैं यह तो विजय बहुगुणा व विधायक गोदियाल या इस प्रकरण के साक्षी रहे लोग ही जान सकते है। परन्तु इतना जरूरी है कि जनप्रतिनिधियों को लोकषाही का पाठ जनता को पढ़ाने से पहले खुद भी सीखना चाहिए। यही नहीं जनभावनाओं का सम्मान करना भी चाहिए। जिस प्रकार प्रदेष के वर्तमान मुख्यमंत्री उत्तराखण्ड की आम जनता के दिलों में खलनायक के रूप में विराजमान होने वाले मुलायम व उनके प्यादों के साथ बड़ी आत्मीयता से मिलते दिखाई देते उससे जनता की भावनाओं को ही नहीं षहीदों की षहादत भी अपमान होती है। मुख्यमंत्री को ही नहीं अधिकाष जनप्रतिनिधियों को जनभावनाओं का सम्मान करना भी सीखना चाहिए और पद की गरीमा की रक्षा भी करनी चाहिए।
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