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Saturday, July 14, 2012

सत्तांधों के लिए नहीं बना है उत्तराखण्ड




काला बाबा की चेतावनी सच साबित हुई 

भले ही आप समझें कि यह उत्तराखण्ड राज्य वहां के लोगों के विकास व हक हकूकों की रक्षा के लिए बना हो तो आप बहुत ही गलत धारणा के शिकार हैं। परन्तु मुझे तो 12 साल के इस राज्य गठन के हुक्मरानों की कार्यप्रणाली के बाद लगता है कि अपने वाजपेयी ने समझा कि यह उत्तराखण्ड उनके मित्र नित्यानन्द स्वामी व अकाली नेता बरनाला के लिए बना था। कांग्रेस आला कमान सोनिया गांधी को लगा कि उत्तराखण्ड तिवारी व विजय बहुगुणा के लिए बना है। तिवारी जी को मुख्यमंत्री बनने के बाद लगा कि शायद यह उत्तराखण्ड, उनके उप्र के आरेन्द्र शर्मा के लिए बना है। भाजपा के नेता खण्डूडी जी को मुख्यमंत्री बनने के बाद लगा कि उत्तराखण्ड उडिसा मूल के सारंगी के लिए बना है। परन्तु निशंक ही ऐसा मुख्यमंत्री रहा जिनको लगा कि यह राज्य केवल उनके लिए ही बना है। वहीं विजय बहुगुणा को लगा कि यह राज्य उनके बंगाली मूल के लोगों, उप्र के आरेन्द्र शर्मा व मायावती के करीबी अधिकारी सिंह के लिए बना है। मैं भी पहले यही समझता रहा कि राज्य शायद उत्तराखण्डियों के विकास के लिए बना है और उन आकांक्षाओं को साकार करने के लिए बना है जिसके लिए उत्तराखण्ड के लोगों ने दशकों तक ऐतिहासिक संघर्ष व बलिदान दिया। परन्तु मेरी धारणा अब टूट गयी है मुझे महान चिंतक व रहस्यमय शक्तियों के स्वामी काला बाबा की टिप्पणी बरबस ही यह देख कर याद आ जाती जो उन्होंने उत्तराखण्ड राज्य गठन के लिए संसद की चैखट राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर पर 6 साल तक चले ‘उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा’ के सफल धरने पर समर्थन में सम्मलित होते हुए बाबा अक्सर मुझसे कहते थे कि देवी जिस उत्तराखण्ड राज्य गठन के लिए अपना जीवन दाव पर लगाये हुए हो, वह उत्तराखण्ड राज्य गठन के बाद देखना सफेदपोश माफियों की ऐशगाह बनेगा। तुम भी मेरी तरह प्रायश्चित करोगे। गौरतलब है कि काला बाबा आजादी के अग्रणी सिपाई थे। वे अक्सर देश को राजनैताओं, नौकरशाहों द्वारा ही नहीं अपितु शिक्षा, चिकित्सा, न्याय व धर्म के मठाधीशों द्वारा बुरी तरह से बर्बाद करने से व्यथित थे। वे देश के अग्रणी राजनेताओं गांधी, नेहरू, सुभाष ही नहीं इंदिरा,मुरारजी, अटल, वीपीसिंह, नरसिंह राव, हेमवती नन्दन बहुगुणा, काशीराम सहित अनैक नेताओं के करीब रहे। इलाहाबाद मूल के व दिल्ली के बाल सहयोग के खण्डरों में रहने वाले रहस्यमय शक्तियों के स्वामी काला बाबा के अनन्य स्नेहियों में हेमवती नन्दन बहुगुणा व नरसिंह राव जैसे राष्ट्रीय नेता थे।
उत्तराखण्ड राज्य का यह दुर्भाग्य रहा कि उत्तराखण्डियों के त्याग व बलिदान की बदौलत गठित उत्तराखण्ड राज्य को तत्कालीन एनडीए के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने समझा कि यह राज्य उनके मित्र नित्यानन्द स्वामी और उत्तराखण्ड का पुरजोर विरोध करने वाले अकाली नेता बरनाला के लिए बना है। उनकी कृपा से उत्तराखण्ड के संसाधनों की बंदरबांट ही नहीं हुई अपितु उत्तराखण्ड के भविष्य पर ग्रहण लगाने के लिए उसके नाम, उसकी सीमा व उसके भविष्य की सुरक्षा रेखा ‘ हिमाचल की भांति प्रदेश में जमीनों की खरीद फरोख्त पर प्रतिबंध लगाने’ व राजधानी गैरसैंण बनाने की पुरजोर मांग को भी रौंदा गया। उसके बाद जनता ने जब वाजपेयी सरकार के विश्वासघात को सबक सिखाने के लिए सोनिया नेतृत्व वाली कांग्रेस पर विश्वास करके जनादेश 2007 में कांग्रेस के पक्ष में दिया तो कांग्रेस प्रमुख ने समझा की शायद उत्तराखण्ड शायद कांग्रेस के दिग्गज नेता नारायण दत्त तिवारी के लिए बना है। हालांकि उस समय भी अधिकांश कांग्रेसी विधायक तिवारी को प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाने के विरोध कर रहे थे। देश के संसाधनों से अपने निहित स्वार्थी चाटुकारों का विकास करने वाले व ‘मेरी लांश पर उत्तराखण्ड बनने की बनने की हुंकार भरने वाले घोर उत्तराखण्ड विरोधी नारायण दत्त तिवारी को प्रदेश का मुख्यमंत्री बन कर न केवल प्रदेश की पूरी व्यवस्था अपितु सामाजिक ताने बाने को अपने उत्तर प्रदेश मूल के प्यादे आरेन्द्र शर्मा व अपनी नौछमी वृति की तृष्ति के खातिर पतन के गर्त में धकेल दिया।
तिवारी के कुशासन से प्रदेश की जनता ने आक्रोशित हो कर भाजपा के घडियाली आंसू पर विश्वास करके उसको प्रदेश की सत्ता सौंपी। कांग्रेस को प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री थोपने के लिए दशकों से आलोचना करने वाली भारतीय जनता पार्टी के आला नेतृत्व ने उत्तराखण्ड के निर्वाचित बहुसंख्यक विधायकों की ‘पूरा जीवन संघ व भाजपा के लिए समर्पित करने वाले जमीनी नेता भगतसिंह कोश्यारी को मुख्यमंत्री बनाने की राय को नजरांदाज करते हुए विधायक न रहते हुए भी सांसद भुवनचंद खंडूडी को प्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिया। खण्डूडी जी जो 58 साल की उम्र तक सेना के उच्च पद पर रहने के कारण अधिकांश समय उत्तराखण्ड की जमीनी हकीकत से कोसों दूर रहे, उन्होंने भ्रष्टाचार को दूर करने व सुशासन देने के लिए तिवारी की तरह कोई जमीनी उत्तराखण्डी पर विश्वास न करके अपने आंखों के तारे उडिसा के अपने कार्यप्रणाली से खण्डूडी की कीर्ति को पूरे प्रदेश में गूंजाने वाले सारंगी को प्रदेश का अघोषित भाग्य विधाता बना दिया। शायद उनको भी लगा होगा कि उत्तराखण्ड सारंगी के लिए ही बना हो। खण्डूडी सेना से सेवा निवृत होने के बाबजूद राजनीति में अपनी जनरली हनक जब अपने विधायकों व मंत्रियों को ही दिखाने लगे और उनकी सांरगी जोरों से बजने लगी तो भाजपा के विधायकों की प्रचण्ड दवाब के कारण तथा लोकसभा चुनाव में उत्तराखण्ड से भाजपा का पूरा सुफडा ही साफ होने से मजबूरी में खण्डूडी को हटा तो दिया परन्तु साफ छवि के वरिष्ट जननेता भगतसिंह कोश्यारी को मुख्यमंत्र.ी बनाने के बजाय पूरे प्रदेश में अपनी विलक्षण प्रतिभा का डंका बजाने वाले रमेश पोखरियाल निशंक को प्रदेश का भाग्य विधाता बना कर दशकों से ‘सुशासन व रामराज्य की राग अलापने वाली संघ व भाजपा ने खुद ही अपना मुखोटा बेनकाब कर दिया। निशंक जी ने भी तिवारी जी की तरह सोचा शायद उत्तराखण्ड के लोगों ने राज्य गठन के लिए ऐतिहासिक संघर्ष व बलिदान उन्हीं की अतृप्त इच्छाओं को पूरी करने के लिए बना है। इसी लिए तो निशंक ने शताब्दियों से संचालित कुम्भ के आयोजन पर भी नोबेल पुरस्कार की मांग करके भाजपा नेतृत्व को भी अचंम्भित कर दिया। निशंक के चंद महिनों के शासन काल में भाजपा के सुशासन व रामराज्य के तराने को जब स्टर्जिया, जल विद्युत परियोजनाये, भूमि आदि प्रकरणों की कृत्यों से आलौकित किया तो भाजपा नेतृत्व को निशंक को हटाना पडा। परन्तु निशंक को हटाने के बाद अपनी भूल को सुधारने की जगह फिर खंडूडी जरूरी का आत्मघाति राग अलापने लगे, उससे कांग्रेस से भी रूष्ट होने के बाबजूद जनता ने भाजपा को ही नहीं खण्डूडी को धूल चटाने को ही श्रेयकर समझा। परन्तु जनता के आगे तिवारी कुशासन का रौना रोने वाली भाजपा के दोनों मुख्यमंत्रियों को तिवारी की तरह जनसंख्या पर आधारित विधानसभाई परिसीमन रौकने, राजधानी गैरसैंण बनाने, प्रदेश के हक हकूकों की रक्षा करने व कांग्रेस के कुशासन की जांच करने की बातें तो याद नहीं रही परन्तु भाजपाई मंचों पर उस तिवारी को गौरवान्वित करना नहीं भूले जिनके कुशासन पर वे जनादेश मांग कर सत्तासीन हुए।
भाजपा के भ्रष्टाचार व थोपशाही से मुक्ति दिलाने के नाम पर जिस षडयंत्र के तहत कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी ने फिर अधिकांश विधायकों की राय को नजरांदाज करते हुए विजय बहुगुणा को प्रदेश का मुख्यमंत्री थोप दिया, उनकी थोपशाही को कांग्रेसी विधायकों ने ही विजय बहुगुणा के शपथ ग्रहण व विधानसभा मे ंशपथ लेने में बहुसंख्या में न पंहुच कर पूरे देश के सामने बेनकाब कर दिया। शायद सोनिया गांधी ने सोचा कि उत्तराखण्डी लोग भी मुम्बई हाईकोट में अपने गौरवशाली कार्यो के लिए विख्यात रहे विजय बहुगुणा की प्रतिभा से लाभान्वित हो। उसी प्रतिभा का परिचय देते हुए तिवारी के मात्र पन्द्रह सालों में सडक से आसमान पर अपना परचम फेहराने वाले तिवारी राज में सुपर मुख्यमंत्री के नाम से विख्यात आर्रेन्द्र शर्मा के साथ साथ उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रही मायावती के दाहिना हाथ रहे कई मामलों के आरोपी अधिकारी को अपना सलाहकार व जनता के विश्वास को रौंदने वालों को अपना करीबी बना कर विजय बहुगुणा ने अपनी मंडली में स्थान दे कर अपने इरादों को जगजाहिर कर दिया। मुख्यमंत्री बनने के बाद विजय बहुगुणा को उत्तराखण्ड की धरती में दिव्य ज्ञान हुआ कि वे बंगाली हैं और बंगाली बाहुल्य सितारगंज विधानसभा के विधायक उनके मूल के भाई हैं। उन्होने अपनी कृपा अपने मूल के समाज पर भूमिधरी का अधिकार दे कर किया। अभी आगे क्या क्या करेंगे यह देख कर उत्तराखण्ड की जनता की आंखें फट्टी की फट्टी रह जाय तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा।
प्रदेश गठन के बाद जो नींव हिमाचल के लिए परमार जी ने रखी थी वही नींव अगर तिवारी रखते तो प्रदेश भी हिमचाल के तर्ज पर देश का सबसे अमन चैन व विकासौनुमुख भ्रष्टाचार रहित राज्य रहता। परन्तु तिवारी जी ने जो आत्मघाति नींव रखी उससे न केवल यहां का वर्तमान अपितु भविष्य भी तबाह हो गया है। यहां पर जहां संसाधनों की बंदरबांट हो रही है, प्रदेश की स्थाई राजधानी गैरसैंण नहीं बनी, जनसंख्या पर आधारित विधानसभाई परिसीमन से राजनैतिक भविष्य तबाह कर दिया गया, मुजफरनगर काण्ड आदि के आरोपियों को सजा दिलाने के बजाय उनको शर्मनाक संरक्षण व बचने की राह दी गयी। जो उत्तराखण्ड देश में ही नहीं विश्व में अपनी बीरता, चरित्र व ईमानदारी से विख्यात रहे इन हुकमरानों के कारण आज देश का सबसे भ्रष्टतम राज्य बन गया है। सबसे चिंता का विषय यह है कि न केवल इन मुख्यमंत्री रहे हुक्मरानों अपितु जो भी आज प्रदेश की राजनीति में हैं उनकी प्राथमिकता व प्रतिबंद्धता कहीं दूर दूर तक उत्तराखण्डियों के हक हकूकों व भविष्य की रक्षा करने के बजाय अपने निहित स्वार्थो के प्रति अधिक है। अब प्रदेश में कांग्रेस भाजपा ने अपनी राजनैतिक स्वार्थो के कारण जातिवाद व भ्रष्टाचार का जहर घोल लिया है। लोग इससे मुक्त होने के बजाय इनका की अंध समर्थन कर रहे हें। एक बात इस प्रदेश के हुक्मरानों व युवाओं को भान रखना ही होगा कि प्रदेश में किसी जाति, धर्म, क्षेत्र का शोषण करने के लिए या बर्चस्व स्थापित करने के लिए नहीं बनाया गया। इसलिए इस संकीर्ण सोच को यहां पर स्थापित करने वालों का पुरजोर विरोध करना ही होगा। तभी प्रदेश बचेगा। युवाओं को इस समस्या को समझ कर उत्तराखण्ड के लिए आगे आना ही होगा तभी प्रदेश बचेगा। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्री कृष्णाय् नमो।

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