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Thursday, May 24, 2012

अमेरिका व सोनिया के आंखों के तारे मनमोहन सरकार के कुशासन से देश में हाहाकार

भले ही सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली सप्रंग सरकार की दूसरी पारी का जश्न प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व उनके सांसद मना रहे हों परन्तु देश में इस मनमोहनी कुशासन से हाहाकार मचा हुआ है। भले ही सप्रंग सरकार की मुखिया का मोह भंग इस कुशासन के प्रतीक मनमोहन सिंह से न हो परन्तु 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव में देश की सत्ता से देश की जनता इसको उतार फेंकने के लिए कमर कसे हुए है। इसकी एक झलक टुडेज चाणक्य ने यूपीए सरकार को आज के दिन चुनाव होने पर केवल 100 सीटें मिलने की भविष्यवाणी से भी किया। यही भविष्यवाणी प्यारा उत्तराखण्ड समाचार पत्र में कई महिने पहले से मैं कर रहा हॅू कि 2014 में होने वाले चुनाव में कांग्रेस ही नहीं भाजपा भी देश की सत्ता में नहीं होगी व नहीं मुलायमसिंह देश की बागडोर संभालेगा। मनमोहन सिंह सरकार की हालत किस कदर देश की आम जनता की नजरों में पतली है इसका सहज अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री द्वारा तीन साल पूरे होने के जश्न में दी गये भोज में समर्थक दलों के मठाधीशों ने आना ही अपनी शान के खिलाफ समझा। एक प्रकार से यूपीए के सहयोगी घटक दलों की नजर में अब कांग्रेस व यूपीए गठबंधन डुबता हुआ जहाज ही प्रतीत हो रहा है। इसी कारण वे समय समय पर इससे अपने आप को दूर दिखाने की कोशिश कर रहे है। देश की जनता मनमोहन सिंह के कुशासन से किस कदर परेशान है इसका नमुना यूपीए सरकार की 22 मई को दूसरी पारी के तीसरे साल पूरे होने पर मनाये जाने वाले जश्न पर आम आदमी के दिल से निकलने वाली इस पुकार से समझी जा सकती है। अमेरिका व सोनिया गांधी के आंखों के तारे भारत को मंहगाई, भ्रष्टाचार व आतंकवाद से बर्बाद करने वाले कुशासन देने के लिए जाने जाने वाले यूपीए सरकार के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लिए सभी देशवासी एक ही दुआ करते हैं कि हे सर्व शक्तिमान परमात्मा ऐसे कुशासक से भारत को अविलम्ब मुक्ति कराये। मनमोहन सरकार ने अटल की तरह देश की आशाओं पर ही नहीं देश के भविष्य पर अमेरिकी व कुशासन का ग्रहण लगाया।
सोनिया गांधी के पास समय था कि देश व कांग्रेस को बर्बाद होने से बचाने के लिए। उनको देश व पार्टी के हित में अविलम्ब मनमोहन सिंह को हटा कर राहुल गांधी को देश की बागडोर सोंप देनी चाहिए थी। इसके लिए वे मनमोहन सिंह को सम्मानजनक विदाई के तौर पर देश का राष्ट्रपति भी बना सकती है। प्रतिभा पाटिल की विदाई तय है और कोई भी दल वर्तमान राष्ट्रपति को दूसरे कार्यकाल के लिए राष्ट्रपति के रूप में समर्थन करने के लिए तैयार नहीं है। देश की वर्तमान राष्ट्रपति श्रीमती देवी सिंह शेखावत पाटिल का कार्यकाल अपने अंतिम दौर में है। इससे साफ हो गया कि देश को नये राष्ट्रपति मिलेगे। नया राष्ट्रपति कौन होंगे इस पर राजनैतिक दलों में इन दिनों घमासान चल रहा है। इन दिनों जो नाम आम जनता से लेकर राजनैतिक दलों के जेहन में उनमें अभी तक देश की अधिकांश जनता की पहली पसंद पूर्व राष्ट्रपति डा अब्दुल कलाम हैं। वेसे अन्य नामों में वर्तमान उपराष्ट्रपति अंसारी, वरिष्ट कांग्रेसी नेता प्रणव मुखर्जी, लोकसभाध्यक्ष मीरा कुमार व देश के अग्रणी चिंतक व राजनेता डा कर्णसिंह आदि के नाम भी चर्चाओं में है। परन्तु जिस प्रकार से कांग्रेसी आलाकमान ने अभी अभी अपने पत्ते नहीं खोले व सपा प्रमुख मुलायम सिंह द्वारा राजनेता को ही राष्ट्रपति के पद पर आसीन होना चाहिए व राजग गठबंधन के प्रमुख दल भाजपा एवम् जदयू में इस मामले में उभरे मतभेद तथा वाम दलों द्वारा प्रणव व उपराष्ट्रपति पर आपत्ति नहीं की बात से ऐसा प्रतीत होता कि राष्ट्रपति जो भी बनेगा परन्तु आपसी एकराय से राष्ट्रपति चयन का यथासंभव प्रयास होंगे। परन्तु सपा, लालु के रूख को देख कर कई बार लगता है कि राष्ट्रपति पर कोई मुस्लिम ही आसीन होगा। परन्तु कांग्रेस आलाकमान इन दिनो गहरे द्वंद में है। जिस प्रकार से कांग्रेसी आलाकमान के करीबी केन्द्रीय रक्षा मंत्री ऐथोनी के नेतृत्व वाली ऐथोनी समिति की रिपोर्ट के अनुसार मंहगाई को भी हाल में सम्पन्न हुए पांच राज्यों में हुई कांग्रेस की दुर्गति के लिए भी जिम्मेदार माना गया है। जिससे साफ हो गया कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार, कांग्रेसी बेडे को चुनावी भंवर में पार लगाने में लाभप्रद नहीं अपितु डुबोने वाली हो गयी है। इसी संदेश को भांपते हुए राजनीति के मर्मज्ञ यह कायश लगा रहे हैं कि कांग्रेस प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को राष्ट्रपति के पद पर आसीन कर देश की जनता का गुस्सा कम करके 2014 में होने वाले लोकसभा में डुबती हुई कांग्रेसी नौका को पार लगाना चाहती है। हालांकि लम्बे समय से मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद से मुक्त करने की मांग कांग्रेसी दबे हुए स्वरों में निरंतर कर रहे है। इनकी भनक सोनिया गांधी व उनके सलाहकारों को भी है। परन्तु सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री पद से मनमोहन सिंह की विदाई सम्मानजनक ढ़ंग से करना चाहती है। इसके लिए एक उचित अवसर कांग्रेस नेतृत्व ने उस समय खो दिया जब विश्व बेंक के अध्यक्ष पद रिक्त हुआ था। उस समय कांग्रेसी रणनीतिकारों को पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले यह कदम उठाने से पंजाब में सत्तासीन होने की आश पर ग्रहण लगने का भय था। पंजाब में विधानसभा चुनावों में मिली पराजय के बाद अब कांग्रेसी नेतृत्व पर मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद से मुक्त करके राहुल गांधी को सत्तासीन करने का निरंतर दवाब उनके विश्वसनीय रणनीति कार दे रहे है। कांग्रेसी राजनीति के समीक्षकों को सोनिया गांधी की इस मुहिम में दो अवरोधक नजर आ रहे है। पहला अवरोधक अमेरिका बना हुआ है, जो किसी भी हाल में नेहरू-गांधी परिवार के किसी वारिस को फिर से देश की सत्ता में आसीन होना नहीं देखना चाहता। अमेरिका के लिए वर्तमान हालतों में सबसे अनुकुल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ही हैं। जिस प्रकार से अमेरिका ने पाकिस्तान के बाद भारत में में अपनी पकड़ पूरे तंत्र में बना ली है उससे कांग्रेस आला नेतृत्व को अमेरिका की इच्छा के खिलाफ मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद से मुक्त कर राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाना आसान नहीं है। सुत्रों के अनुसार मनमोहन सिंह को देश के प्रधानमंत्री पद पर आसीन करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण अगर कोई कारण रहा तो वह है अमेरिका का दवाब।
अमेरिकी दवाब के अलावा दूसरी बाधा अगर मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद से मुक्त कर राहुल को प्रधानमंत्री बनाने के मार्ग में दूसरी कोई रूकावट है तो वह सप्रंग गठबंधन की सहयोगी दल न हो कर खुद सोनिया गांधी के अपने निकट के सलाहकार है। जिनको राहुल गांधी के प्रधानमंत्री के पद पर आसीन होने से अपनी वर्तमान प्रभावकारी स्थिति गुमनामी में खोने की आशंका है। इसी आशंका के कारण सोनिया गांधी के वर्तमान मजबूत सहयोगी, सोनिया गांधी को व कांग्रेसी बडे नेताओं के बीच ऐसा माहौल बना रहे हैं कि मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री के पद से मुक्त करके राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने से कांग्रेस का कोई बडा नुकसान हो जायेगा। हालत यह है कि कई जानकार तो यह भी आरोप लगा रहे हैं कि कांग्रेसी मजबूत मठाधीश नहीं चाहते कि कांग्रेस मजबूत हो और राहुल गांधी प्रधानमंत्री बने। खबर तो यह भी है कि इसी आशंका से भयभीत कई कांग्रेसी मठाधीशों ने राहुल गांधी के कांग्रेस को उप्र सहित देश में मजबूत करने के मिशन पर पानी फेरने के लिए पसीने बहाये थे। उप्र में इतनी मेहनत के बाद कांग्रेसी की हुई दुर्गति इसी आशंका को मजबूत करती है। कांग्रेसियो की इस आशंका को तब बल मिलता है जब सोनिया व राहुल गांधी को इन मठाधीशों ने जनता से बिलकुल दूर कर दिया है। जो लोग भी सोनिया व राहुल से मिलाये जाते हैं वे प्रायः इन्हीं मठाधीशों के चाटुकार होते है। न तो ये सलाहकार खुद कभी आम जनता से मिलते हैं व नहीं वे अब सोनिया व राहुल गांधी को भी जनता से अपने तिकडमों से दूर किये हुए है। अब देखना यह है कि सोनिया गांधी कैसे मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री से मुक्त करने के इस अवसर का लाभ उठा कर देश व कांग्रेस की रक्षा कर सरती है या अपने आत्मघाती सलाहकारों के मकड़जाल में रह कर यह अवसर भी खो देती है। वेसे सोनिया गांधी की रणनीति हे कि लालकृष्ण आडवाणी को विश्वास में लेकर भाजपा व कांग्रेस में इस मामले में सहमति बना कर राष्ट्रपति व उप राष्ट्रपति के पद को सांझा किया जाय। अगर सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह को देश का राष्ट्रपति बनाने में सफल रहती तो मनमोहन सिंह देश के ऐसे पहले व संसार के दूसरे नेता बन जायेंगे जो प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति दोनों पदों पर रूस के राष्ट्रपति पुतिन की तरह आसीन रहे हों।
शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्री कृष्णाय् नमो।

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