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Saturday, May 12, 2012


अवतार को महाधिवक्ता नहीं अपर महाधिवक्ता  बना कर मुख्यमंत्री ने उडाया उत्तराखण्ड व न्याय व्यवस्था का मजाक 

विजय बहुगुणा सरकार ने वरिष्ठ अधिवक्ता अवतार सिंह रावत को अपर महाधिवक्ता के पद पर आसीन 


देहरादून (प्याउ)। प्रदेश सरकार ने अपर महाधिवक्ता के पद पर अवतार सिंह रावत की नियुक्त करने की खबर को जिस प्रमुखता से विजय बहुगुणा सरकार ने प्रदेश के समाचार जगत में प्रकाशित कि वह अपने आप में प्रदेश सरकार के मुख्यमंत्री द्वारा महाधिवक्ता के पद पर उनके द्वारा की गयी विवादस्थ नियुक्ति की चारों तरफ हो रही आलोचना पर पर्दा डालने के लिए उठाया गया एक कदम माना जा रहा है। गौरतलब है पूर्ववर्ती प्रदेश भाजपा सरकार के स्टर्जिया जैसे भ्रष्टाचार को उच्च न्यायालय से लेकर सर्वोच्च न्यायालय में बेनकाब करने वाले अवतार सिंह रावत न केवल सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ जुझारू अधिवक्ता हैं अपितु उत्तराखण्ड राज्य गठन के प्रमुख संगठन ‘उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा के संयोजक भी है। उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष देवसिंह रावत ने बहुगुणा सरकार द्वारा संवैधानिक पदों पर विवादस्थ लोगों को आसीन करके उत्तराखण्ड व न्याय के साथ अपने निहित स्वार्थ के लिए खिलवाड करने का आरोप लगाया। छह साल तक ऐतिहासिक धरना प्रदर्शन व आंदोलन करने वाले उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष देवसिंह रावत ने कहा कि अगर कांग्रेस के दिल्ली में मठाधीश बने नेताओ ंव वर्तमान मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा में जरा सी भी नैतिकता होती या उत्तराखण्ण्ड के हितों के प्रति जरा सी भी लगाव होता तो तो वे कभी किसी विवादस्थ आदमी को संवैधानिक महत्वपूर्ण पदों पर आसीन करने की धृष्ठता नहीं करते। श्री रावत ने अफसोस जताया कि जो मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को अपर महाधिवक्ता बनाते समय अवतार सिंह रावत की प्रतिभा के कसीदे पढ़ रहे थे, वह कसीदे उनको प्रदेश का महाधिवक्ता बनाते समय क्यों याद नहीं रहे। मोर्चा के अध्यक्ष देवसिंह रावत ने मुख्यमंत्री को याद दिलाया कि जब वे अपने घरों में मोज ले रहे थे तब उत्तराखण्ड के मान सम्मान व पृथ्क राज्य गठन के लिए  सर्वोच्च न्यायालय के प्रतिष्ठित अधिवक्ता होते हुए भी सडकों में पुलिस प्रशासन की लाठियां व जनता को संगठित कर आंदोलन को मजबूत करने में लगे हुए थे । यही नहीं अवतार सिंह रावत  राज्य आंदोलन में 1994 में अकेले ही मुलायम सिंह की दिल्ली रेली में घुस कर अपनी जान कर परवाह न करते हुए मुलायम व उनके हजारों समर्थकों के सम्मुख उनका सार्वजनिक विरोध किया। यही नहीं राज्य गठन आंदोलन में उत्तराखण्ड राज्य गठन में उत्तराखण्ड छात्र संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तराखण्ड महिला संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तराखण्ड महिला मंच, उत्तराखण्ड अर्ध व पूर्व सैनिक संगठन   सहित दर्जनों संगठनों को एकसुत्र में पिरोकर राज्य गठन आंदोलन को धारधार बनाया। उन्ही की सरपरस्ती में उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा ने 1994 से लेकर राज्य गठन के ऐलान तक 16 अगस्त 2000 तक संसद की चैखट जंतर मंतर पर निरंतर 6 साल का ऐतिहासिक सफल घरना प्रदर्शन जनांदोलन चला कर भाजपा, कांग्रेस, सपा, बसपा सहित तमाम उत्तराखण्ड राज्य गठन का विरोध व इस मांग की आड में अपनी राजनैतिक रोटियां सेकने वालों का मुंहतोड़ जवाब ही नहीं दिया अपितु उत्तराखण्ड विरोधी राजनेताओं को खदेड़ने का भी काम किया।
 हालांकि  इससे पूर्व वर्ष 2002 से 2007 में भी अवतार सिंह रावत तिवारी के नेतृत्व में आसीन कांग्रेसी राज्य सरकार के अपर महाधिवक्ता रह चुके हैं। मुख्य सचिव की अध्यक्षता में गठित संवीक्षा समिति की संस्तुति के आधार पर ही अवतार सिंह रावत का चयन किया गया है। इस समिति में प्रमुख सचिव न्याय, प्रमुख सचिव गृह, अपर सचिव न्याय एवं संयुक्त सचिव न्याय सदस्य हैं। आश्चर्य की बात तो यह है अवतार रावत की जिन प्रतिभाओं के कसीदे मुख्यमंत्री व उनका प्रशासन अब पढ़ रहा है वह कसीदे वे महाधिवक्ता के पद पर आसीन करते समय वे क्यों भूल गये। अब कहा जा रहा है कि उच्च न्यायालय, नैनीताल में राज्य सरकार का पक्ष प्रभावी ढंग से रखने के लिए मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने अपर महाधिवक्ता के पद पर वरिष्ठ अधिवक्ता अवतार सिंह रावत की नियुक्ति करने की बात कह रहे है। मुख्यमंत्री के अनुसार श्री रावत अनुभवी अधिवक्ता हैं और उनके अनुभवों का लाभ राज्य सरकार को मिलेगा। परन्तु मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा जो स्टर्जिया प्रकरण पर अवतार सिंह रावत की प्रतिभा की मुक्त कण्ठों से चंद महिने पहले विधानसभा चुनाव से पहले दिल्ली में प्रशंसा कर रहे थे उनको महाधिवक्ता बनाते समय क्यों विस्मरण हो गया। ऐसी ही प्रशंसा कांग्रेस के दिल्ली दरवार के बडे नेता व प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री भुवनचंद खंडूडी, भगतसिंह कोश्यारी सहित प्रदेश के अधिकांश न्यायविद कर चूके है। प्रदेश के तमाम आंदोलनकारी, सामाजिक संगठनों ने मुख्यमंत्री द्वारा महाधिवक्ता के पद पर नियुक्ति की बड़ी भत्र्सना की थी। खुद कांग्रेस के केन्द्रीय प्रभारी चैधरी बीरेन्द्रसिंह, वरिष्ठ नेता सतपाल महाराज, केन्द्रीय मंत्री हरीश रावत, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष यशपाल आर्य, तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष डा हरकसिंह रावत आदि ने विजय बहुगुणा से प्रदेश के महाधिवक्ता पर पर उच्च न्यायालय व सर्वोच्च न्यायालय में अपने कौशल का परचम फेहरा चूके  अवतार सिंह रावत महाधिवक्ता बनाने की सलाह दी थी। परन्तु मुख्यमंत्री ने न जाने किन निहित स्वार्थो की पूर्ति के लिए इस पद पर ऐसे व्यक्ति को आसीन किया जिसके विरोध में प्रदेश के आंदोलनकारियों ने इसका पुरजोर विरोध किया। वहीं कांग्रेसी दिग्गज भी इस प्रकरण से हैरान थे।  शायद इसी गलती पर पर्दा डालने के लिए मुख्यमंत्री ने अवतार सिंह रावत को अपर महाधिवक्ता के पद पर आसीन करने का निर्णय लिया। अब गैंद अवतार सिंह रावत के पाले में है कि वे इस प्रस्ताव को स्वीकार करते है। सुत्रों के अधिवक्ता अवतार सिंह रावत, पहले ही सरकार की इस पहल पर अपना नाखुशी जाहिर कर चूके थे। अब उनका कहना है कि पूर्ण अधिकार व सम्मान के बिना वे किसी पद को स्वीकार नहीं करेंगे। अभी उनको सरकार का प्रस्ताव नहीं मिला। उस प्रस्ताव का अध्ययन करने के बाद वे इस पर कोई टिप्पणी करेंगे। उनका कहना है कि कोई पद या सम्मान उत्तराखण्ड से बढ़ कर नहीं है। अगर उचित अधिकार होंगे तो उत्तराखण्ड के हितों की रक्षा के लिए वे सम्मान के साथ भ्रष्टाचार को बेनकाब करने के लिए यह दायित्व स्वीकार भी कर सकता हॅू। परन्तु केवल लेबन चिपकाने व किसी के हाथों की कठपुतली बनने के लिए वे किसी पद व कार्य को स्वीकार नहीं करेंगे।

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