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Monday, May 14, 2012



उत्तराखण्ड राज्य गठन के भाग्य विधाताओं के संकीर्ण निर्णयों से ही लगा उत्तराखण्ड के वर्तमान व भविष्य पर ग्रहण

मुख्य न्यायाधीश के नैनीताल उच्च न्यायालय की  नैनीताल में स्थापित करने के निर्णय व इसकी पीठ स्थापित करने की मांग पर उठाये प्रश्न से फिर जनता के कटघरे में खडे हुए भाग्य विधाता

देहरादून (प्याउ)। उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश बारिन घोष के नैनीताल उच्च न्यायालय की खण्ड पीठ को देहरादून या हरिद्वार में स्थापित करने की मांग पर प्रश्न चिन्ह लगाते हुए प्रदेश के सबसे मंहगे शहर नैनीताल में उच्च न्यायालय स्थापित करने  पर भी सवाल उठा कर प्रदेश की भोली भाली जनता को राज्य गठन के समय हुए जनविश्वास के साथ इसके भाग्य विधाता बने लोगों के निर्णयों पर एक बार फिर नजर दोडाने के लिए विवश कर दिया।
उत्तराखण्ड राज्य गठन के समय प्रदेश के दूरगामी हितों के प्रति दुराग्रही व संकीर्ण सोच के कारण प्रदेश की आम जनता को कितना दण्ड भोगना पड़ता है यह उत्तराखण्ड राज्य स्थापना के समय भाग्य विधाता बने हुक्मरानों की तंगदिली सोच से आज देश का सबसे भ्रष्ट राज्य में सुमार हुए इस सबसे ईमानदार समझे जाने वाले उत्तराखण्डियों के राज्य उत्तराखण्ड की वर्तमान दुर्दशा से ही उजागर हो जाती है। मामला प्रदेश की भू सीमा में पूरे हरिद्वार जनपद मिलाने का हो या प्रदेश की स्थाई राजधानी गैरसेंण बनाने की जनता की सर्व सम्मत मांग को दरकिनारे करके नादिरशाही की तरह बलात देहरादून थोपने का हो, या प्रदेश का जनता व संघर्ष का अपना नाम उत्तराखण्ड को बलात दलीय हितों के पोषण के लिए उत्तरांचल थोपने का हो या प्रदेश के उच्च न्यायालय की स्थापना आम जनता के हित की रक्षा करने के बजाय प्रदेश के सबसे मंहगे शहर नैनीताल में स्थापित करने का हो या प्रदेश के जमीनी पकड़ वाले नेता को मुख्यमंत्री बनाने के बजाय बलात जनता की पीड़ा से अनंजान नित्यानन्द स्वामी को थोपने का हो, इन सब मामलों से साफ हो गया था कि राज्य गठन के समय प्रदेश के भाग्य विधाता जो बने थे उनको प्रदेश के दूरगामी हितों व जनहितों की कहीं दूर तक भी न तो चिंता थी व नहीं कोई प्राथमिकता थी। वे केवल अपने संकीर्ण दलीय व निहित सम्बंधों को राज्य हितों पर थोपने वाले नादिरशाह से कम नहीं थे। यह ऐसा नहीं कि कोई बिना सोचे समझे हुआ हो अपितु यह जानबुझ कर किया गया। प्रदेश की जनता की मांग थी कि प्रदेश का सामाजिक व भौगोलिक परिस्थितियों व सामाजिक तानेबाने को देखते हुए केवल राज्य में हरिद्वार जनपद का कुभ क्षेत्र को ही सम्मलित किया जाय। आज पूरे हरिद्वार जनपद को सम्मलित करने के कारण विकास के लिए उपेक्षित उप्र के इस पहाड़ी क्षेत्र उत्तराखण्ड की संकल्पना व उदेश्य ही यहां के तिवारी व खण्डूडी जैसे नक्कारे नेतृत्व की अदूरदर्शी सोच के कारण जनसंख्या पर आधारित विधानसभाई परिसीमन से रौद कर रख दिया है। ऐसा ही प्रदेश की स्थाई राजधानी गैरसेंण के मामले को लेकर भी है। जो राज्य व आंदोलन का गठन व संचालन ही उप्र के विकास से उपेक्षित पर्वतीय क्षेत्र के त्वरित विकास व संस्कृति की रक्षा के लिए बनाया गया था वह अवधारणा तत्कालीन भाग्य विधाता बने अटल बिहारी वाजपेयी सरकार से उत्तराखण्ड मामलों के स्वयंभू ध्वजवाहक मुरली मनोहर जोशी, नारायण दत्त तिवारी व केसी पंत ने मिल कर सदा के लिए जमीदोज कर दिया। प्रदेश का गठन ही इस प्रकार से किया गया कि ताकि उत्तराखण्ड कभी अपने उस महान स्वप्न को साकार न कर पाये जिसके लिए उत्तराखण्ड के सपूतों ने अपना बलिदान दे कर व मुलायम व राव जैसे जनविरोधी सरकारों के अमानवीय अत्याचार सह कर भी ऐतिहासिक संघर्ष की धधक से सरकार को राज्य गठन के लिए मजबूर किया था। उस संघर्षो से गठित राज्य का  वर्तमान ही नहीं अपितु भविष्य दोनों को राज्य गठन के समय भाग्य विधाता बने इन बोनी सोच के संकीर्ण नेताओं ने उपरोक्त गलत निर्णय थोप कर सदा के लिए जमीदोज कर दिया।
न्यायमूर्ति घोष ने देहरादून बार एसोसिएशन द्वारा सोमवार 14 मई  को  आयोजित मुख्य न्यायाधीश के सम्मान समारोह में ज्वलंत मुद्दे पर अपने बेबाक बात रखते हुए कहा कि राज्य निर्माण से पहले देहरादून में बेहतर वकीलों की फौज थी। फिर जब उच्च न्यायालय की स्थापना हो रही थी तब यह निर्णय क्यो नहीं लिया गया कि उच्च न्यायालय देहरादून या हरिद्वार में बने। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि वह जानते हैं कि वादकारी के लिए नैनीताल बहुत मंहगा शहर है । लेकिन अब ऐसी सूरत में इस समस्या का क्या समाधान हो सकता है? उन्होने सवाल किया अब देहरादून में यदि उच्च न्यायालय की बेंच स्थापित कर दी जाएगी तो उस स्थिति में नैनीताल उच्च न्यायालय का क्या महत्व रह जाएगा। मुख्य न्यायाधीश घोष ने कहा कि यदि मान भी लिया जाए कि राजधानी में उच्च न्यायालय की बेंच स्थापित कर दी जाती है और नौ में से छह न्यायाधीश यहां बैठा दिए जाते हैं तो फिर हाईकोर्ट में क्या काम रह जाएगा। बेंच स्थापना के बाद देहरादून, हरिद्वार के साथ ही गढ़वाल के सभी जनपदों का कामकाज फिर बेंच ही निस्तारित करने लगेगी तो फिर उच्च न्यायालय की जरूरत ही कहां रह जाएगी? न्यायमूर्ति घोष ने कहा कि राज्य निर्माण से पहले देहरादून में बेहतर वकीलों की फौज थी। फिर जब उच्च न्यायालय की स्थापना हो रही थी तब यह निर्णय क्यो नहीं लिया गया कि उच्च न्यायालय देहरादून या हरिद्वार में बने। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि वह जानते हैं कि वादकारी के लिए नैनीताल बहुत मंहगा शहर है लेकिन अब ऐसी सूरत में इस समस्या का क्या समाधान हो सकता है? मुख्य न्यायमूर्ति द्वारा उच्च न्यायालय की बैंच की मांग को जिस बेबाक ढ़ग से औचित्यहीन बता दिया, उसके बाद भले ही यह आंदोलन बद न भी हो परन्तु इससे एक बात साफ हो गयी कि राज्य गठन के समय जो भी इस प्रदेश के भाग्य विधाता बने थे उन्होंने संकीर्ण निर्णय ले कर प्रदेश के हितों पर ऐसा कुठाराघात किया जो आज प्रदेश के लिए गले की फांस बन गये है। इन आत्मघाती निर्णयों से प्रदेश का वर्तमान नेतृत्व कैसे निजात पाता यह उसके राजनैतिक कौशल पर निर्भर करता। परन्तु दुर्भाग्य यह है कि प्रदेश में कभी तिवारी जैसे घोर उत्तराखण्ड विरोधी संकीर्ण नेतृत्व यहां पर सत्तासीन होते हैं तो कभी खंडूडी, निशंक व बहुगुणा जैसे नेता भाग्य विधाता बना कर इनके राजनैतिक आकाओं द्वारा थोपे जाते है। प्रदेश की जनता कुशासन से इतनी बदहाल है व बुद्धिजीवि अपने निहित स्वार्थों में इतने अंधे हो गये हैं कि उनको इस दिशा में सोचने की भी सुध तक नहीं है। जो चंद लोग इस दिशा में काम कर भी रहे हैं व असंगठित व उपेक्षित है। अब भी समय है कि प्रदेश की जनता यहां पर जिस प्रकार से भाजपा व कांग्रेस के दिल्ली आका अपने स्वार्थो की पूर्ति के लिए यहां की लोकशाही को रोंदते हुए अपने प्यादों को यहां पर मुख्यमंत्री बना कर थोप रही है,उससे सजग होने कीं। इसके साथ इनके प्यादों की तिकडम से उत्तराखण्ड बचाते हुए प्रदेश की दिशा व दशा को सही पटरी पर स्थापित करने की।

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