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Tuesday, May 1, 2012


आज का चिंतन       

मल अपने उदर में भी हो तो उसका विसर्जन किया जाता है

बात ठाकुर या पण्डित आदि जाति की नहीं बात है लोकशाही की। यहां बात न किसी भाजपा व कांग्रेस की भी नहीं है। यहां पर हम बात कर रहे हैं केवल उत्तराखण्ड की। भारत की लोकशाही की है। यहां पर बात हो रही है अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की। लोकशाही में जनभावना के साथ हमेशा प्रतिभा का भी सम्मान होना चाहिए। प्रकृति व हमारी सास्वत संस्कृति में भी यही प्रचलित है घर में जब शव अपने बाप का भी हो तो उसका अंतिम संस्कार कर दिया जाता है तथा मल अपने उदर में भी हो तो उसका विसर्जन किया जाता है। इनसे आसक्ति करने वाला अपने ही पैरों में कुल्हाडी मारता है।
उत्तराखण्ड के सन्दर्भ में राज्य गठन के बाद से ही सन् 2000 से ही भाजपा व कांग्रेस के दिल्ली के मठाधीशों ने उत्तराखण्ड में लोकशाही का गला घोंट कर तथा अधिकांश विधायकों की मांग को रोंदते हुए जिस प्रकार से तिवारी, खण्डूडी व निशक और अब विजय बहुगुणा को थोपा उससे उत्तराखण्ड की लोकशाही की निर्मम हत्या की गयी। खासकर जिस प्रकार से यहां पर मुख्यमंत्री के पद पर आसीन हो कर न केवल मुख्यमंत्री के पद पर अपितु अधिकांश महत्वपूर्ण मंत्रालयों, दायित्वधारियों, शासन प्रशासन में घोर जातिवाद व क्षेत्रवाद फेलाया गया उससे उत्तराखण्ड की लोकशाही जहां मरणाशन है वहीं उत्तराखण्ड में भ्रष्टाचार के गर्त में आकंठ फंस चूका है। वहीं सामाजिक तानाबाना बुरी तरह से छिनभिन्न हो रहा है। यहां पर जितने भी ये मुख्यमंत्री आसीन हुए उन्होंने उत्तराखण्ड की जनभावनाओं को रौंदा, न तो प्रदेश की स्थाई राजधानी गैरसेंण का बनाया व नहीं जनसंख्या पर आधारित परिसीमन को रौका, यही नहीं न तो मुजफरनगर काण्ड के दोषियों को सजा देने के लिए ईमानदारी से कोई पहल तक की, पहल तो दूर इसके दोषियों को संरक्षण देने वालों को प्रदेश के महत्वपूर्ण पदों पर आसीन किया। यह किसी सम्मानित समाज व प्रदेश के मुंह पर जूता मारने से कम नही है। वेसे भी लोकतंत्र में सर भी गिने जाते है यानी भागेदारी को भी महत्व दिया जाता है। यहां पर हमारा केवल यही मानना है कि जिन लोगों का इतिहास ही नहीं वर्तमान व्यवहार भी लोकशाही व न्याय का गला घोंटने का रहा हो, जो चंद चांदी के सिक्के के लिए मान मर्यादाओं, न्याय व जनभावनाओं को रौंद सकते है ऐसे व्यक्तियों को कभी संवैधानिक पदों पर आसीन नहीं किया जाना चाहिए। अगर इसके बाबजूद कोई कहे कि हम देश, समाज व प्रदेश की मर्यादाओं को तार तार करने वाली भाजपा व कांग्रेस के कुकर्मो को देख कर भी उसका अंध समर्थन करे तो ऐसे बंधुआ मजदूरों से हम माफी मांग सकते है। जो लोग अपने सम्मान, मर्यादाओं व भविष्य को रौंदने वालो को विरोध करने का हिम्मत तक नहीं जुटा पाते हैं ऐसे लोगों से कम से कम मैं माफी मांग सकता हूूॅ।

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