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Friday, April 13, 2012

आखिर कब मिलेगी भारत को इंडिया से आजादी


आखिर कब मिलेगी भारत को इंडिया से आजादी
-विदेशी भाषा, विदेशी नाम, भारत आज भी है इंडिया का गुलाम

21 अप्रैल 1989 को संसद में अंग्रेजी मुर्दाबाद के नारे गूंजाने के बाद सुरक्षा कर्मियों ने संसद दीर्घा से मुझे गिरफतार किया गया तो मुझसे जो पूछताछ की गयी उसमें मैने साफ कहा कि इस संसद ने देश की आजादी को अंग्रेजी का गुलाम बना रखा है, इसी लिए इस संसद से भारत की आजादी को मुक्त करने की दो टूक बात कहने के लिए मेने यह नारेबाजी की। इसकी मुझे यदि फांसी की सजा भी दी जाय तो मुझे स्वीकार है। क्योंकि मेरा मानना है कि आजाद भारत मे देश के भाषाओं के बजाय उसी विदेशी भाषा से देश का पूरा तंत्र संचालित करना देश की आजादी को बंधक बनाने जैसा राष्ट्रद्रोह है। इस कलंक को ढोने के कारण भले ही फिरंगियों से 15 अगस्त की आधी रात में जो आजादी मिली थी उस आजादी का सूर्योदय ही आज भी भारत में नहीं हुआ। यह भारतीय आजादी के लिए अपनी शहादत देने वाले हजारों देशभक्तों की शहादत का अपमान है। यह अपमान है भारतीय स्वाभिमान के लिए अपना पूरा जीवन होम करने वाले लाखों आजादी के दिवानों के संघर्ष का। आज भी आजादी के 65 साल बाद भी देश के ये नपुंसक हुक्मरान देश को अपना नाम भारत, भाषा हिन्दी या भारतीय भाषा तक नहीं दे पाये, तो संस्कृति दिलाने की बात तो बहुत दूर की है। आज दुर्भाग्य यह है कि देश उसी फिरंगी गुलामी के प्रतीक इंडिया, इंग्लिश व काॅमनवेल्थ का बदनुमा कलंक देश के माथे पर ढो रहा है। सबसे शर्मनाक बात यह है कि देश की अधिकांश तथा कथित प्रबुद्धजन इस कलंकों को ढोने में ही देश का गौरव मान रहे हैं।
हिन्दी सहित भारतीय भाषाओं की आजादी की इस लडाई को मैने खुद संसद से लेकर सड़क में विगत 30 से अधिक सालों से लड रहा हॅू। देश की आजादी की मुक्ति के लिए मैं भारतीय मुक्ति सेना के प्रमुख होते हुए मैं अपनी आवाज को 1989 को संसद की दर्शक दीर्धा से व उसके बाद संघ लोकसेवा आयोग सहित भारतीय भाषा संरक्षण संगठन के पुरोधा पुष्पेन्द्र चैहान व राजकरण सिंह आदि साथियों के साथ संघर्ष करता रहा। इस संघर्ष में पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, वीपीसिंह, उप प्रधानमंत्री देवीलाल, आडवानी, पासवान सहित देश के तमाम वरिष्ठ सम्पादक पत्रकार व बुद्धिजीवियों के अलावा सेकडों समाजसेवी भी सम्मलित रहे। आई आईटी में भारतीय भाषाओं के सम्मान के लिए डा श्यामरूद्र पाठक के संघर्ष में भी साथी रहा। भारतीय स्वाभिमान के प्रतीक भारतीय भाषाओं के अपमान करने के लिए दिल्ली के विख्यात सेंट कारमल स्कूल के प्राद्यानाचार्य व राज्य सभा की उप सभापति नजमा हेपतुल्ला की गिरफतारी के लिए संसद की चैखट पर अंग्रेजी हुकुमत का झण्डा का दहन करते हुए फिरंगी सम्राज्ञी से अपने गुलाम कुत्तों को भारत से वापस बुलाने के लिए प्रदर्शन किया था। मैं समय समय पर जनमानस को इस दिशा में जागृत करने का प्रयास कर रहा हॅू। सर्वोच्च न्यायालय में भारतीय भाषाओं पर जो संकीर्ण नजरिया महान विचारक लक्ष्मीमल ंिसघवी की गुहार पर दिखाइ्र गया उससे उनकी पीड़ा को देख कर मुझे न्यायालय से कोई आशा नहीं दिखाई दे रही है । क्योंकि इस व्यवस्था में अधिकांश मैकाले के रक्तबीज की काबिज है आज राष्ट्रभक्तों का अभाव हो गया। फिर भी इस दिशा में जो भी साथी काम कर रहे हैं उनको शतः शतः नमन्।
अंग्रेजी भाषा, अंग्रेजी ही तंत्र
नहीं है भारत आज भी स्वतंत्र
भारत नहीं इंडिया हुआ आजाद
देश आज भी है क्यों परतंत्र
जनतंत्र में गुलामी के प्रतीक भाषा, नाम और संस्कृति को स्वतत्र देश में बलात थोपना लोकशाही का गलाघोटने के समान है। देश में  फिरंगी की भाषा थोपे रखना देश के स्वाभिमान, आजादी व संस्कृति से द्रोह है। इसके लिए आजादी के बाद से अब तक की सभी सरकारें जिसमें कांग्रेस, भाजपा व अन्य दल सम्मलित है, सभी इस देशद्रोह के लिए जिम्मेदार है।
आज भी इस संघर्ष को निरंतर छेड़े हुए है। संघर्ष के साथी भले ही बदल गये परन्तु मिशन जारी है भारत की आजादी को मुक्ति दिलाने का। भारतीय लोकशाही की स्थापना का। मुझे मालुम हे कि देश आज पूरी तरह से इस गुलामी में जकड़ गया है इसको मुक्ति दिलाने के लिए अब आजादी से बढ़ कर संघर्ष करना पडेगा। सबसे चिंता की बात यह है कि देश का आम जनमानस नहीं तथाकथित प्रबुद्ध वर्ग ही आज अंग्रेजी गुलामी का दास बन चूका है। हालत यह है कि देश में भ्रष्टाचार की बात करने वाले अण्णा हजारे व उनके साथी भी भारत की नहीं इंडिया की बात करता है और भाजपाई कालनेमियों की तरह इंडिया अगेस्ट करप्शन के नाम पर आंदोलन कर रहे है। केवल बाबा राम देव इसकी महता को समझे है। परन्तु वे भी कई मामलों में भ्रमित है। इसलिए मैं इस आंदोलन को आत्मबल पर लड़ रहा हॅू, जिसके आगे जन, धन व अन्य तमाम बल पानी भरते है। जीत हमारी निश्चित है। पहले भी हुई और आगे भी होगीं। क्योंकि जहां सत है वहीं जीत है। वहीं श्रीकृष्ण है वहीं श्री विजय है। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।

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