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Monday, April 2, 2012

.बहुगुणा के चक्रव्यूह में फंसे हरीश रावत व महाराज


.बहुगुणा के चक्रव्यूह में फंसे  हरीश रावत व  महाराज
.असहाय व कमजोर मुख्यमंत्री की छाया से उबरने में जुटे बहुगुणा 
.यदि आज के दिन प्रदेश विधानसभा के चुनाव हो जायें तो दहाई का अंक भी नहीं छू पायेगी कांग्रेस

  विधानसभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री के पद के लिए मचे गुटीय क्षत्रपों की खुली जंग के कारण मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा पर जनता की नजरों में असहाय व अपने समर्थक विधायकों का जो ठप्पा लग गया , उससे उबरने के लिए मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने कई लोकलुभावन कदम उठाने का ऐलान किया। इसके तहत बेरोजगारी भत्ता का ऐलान हो या जब तक वह उत्तराखंड विधानसभा के सदस्य निर्वाचित नहीं हो जाते, प्रदेश से कोई भत्ता व वेतन ग्रहण नहीं करने का ऐलान। या हर दिन जनता की समस्याओं के निराकरण के लिए वह अपने आवास पर सुबह 9.30 से 11 बजे तक रोज सुनवाई करने  तथा यही नहीं इसके बाद सचिवालय में 11.30 से 1.30 बजे तक अधिकारियों के साथ बैठक एवं अन्य शासकीय कार्य निपटायेंगे। ये सब कदम भी राजनैतिक समीक्षक इसी दिशा में अपनी कमजोर असहाय मुख्यमंत्री की जनता के नजरों में बन गयी छवि को धोने के लिए उठाया गया एक चतुराई भरा कदम मान रहे है। इसी रणनीति के तहत विजय बहुगुणा गुट के चक्र्रव्यूह में फंस कर कांग्रेस के दोनों जमीनी नेता हरीश रावत व सतपाल महाराज बुरी तरह से वाकयुद्ध में उलझ गये है। दोनों गुटों के आपसी वाकयुद्ध में साफ हो गया कि विजय बहुगुणा गुट के चक्रव्यूह में फंस कर दोनों अधिसंख्यक विधायकों के साथ हो कर भी सत्ता से दूर रहने को मजबूर हुए ।  यही नहीं दिग्गज नेता हरीश रावत व सतपाल महाराज की आपसी अहं की जंग ने विजय बहुगुणा को प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाने के कांग्रेसी आला नेतृत्व के आत्मघाती सलाहकारों के षडयंत्र को साकार करने में जहां सफलता मिली वहीं अब दोनों की जंग जारी रख कर वे अपनी सरकार बहुत ही मजबूती से चलाने की रणनीति पर भी अमल कर रहे हैं। इसी रणनीति के तहत विद्रोह की मशाल जलाने वाले अन्य क्षत्रप व मुख्यमंत्री के प्रबल दावेदार डा हरक सिंह रावत को भी अपनी धार कुंद करने के लिए विवश कर देंगे। राज्य गठन के बाद प्रथम विधानसभा चुनाव 2002 से लेकर 2012 में होने वाले तीसरे विधानसभाई चुनाव में हरीश रावत व सतपाल महाराज के आपसी अहं की जंग ने पूरे प्रदेश के भविष्य पर तिवारी, खण्डूडी व निशंक जेसे हुक्मरान ढोना पडा रहा है। इसके कारण प्रदेश में जहां घोर जातिवाद, क्षेत्रवाद के अलावा भ्रष्टाचारी कुशासन का तांडव ही मचा हुआ है। जन नेताओं के बजाय दिल्ली दरवार के थोपे नेताओं को प्रदेश की कमान सोंपे जाने के कारण आज तक 12 साल में कोई भी सरकार प्रदेश की जनभावनाओं का सम्मान तक करने की कोशिश तक नहीं है।
गौरतलब हैं कि  70 सदस्यीय उत्तराखण्ड प्रदेश की विधानसभा में कांग्रेस के 32 विधायक है। वहीं भाजपा केवल एक सीट कम ला कर प्रदेश की सत्ता से बाहर हो गयी। प्रदेश की विधानसभा में भाजपा की 31 विधायक है। इस तरह एक विधायक अधिक आने के कारण कांग्रेस को सरकार बनाने का पहला अधिकार मिला, जिसे कांग्रेस ने 3 कांग्रेसी विद्रोही रहे निर्दलीय विधायक, एक उक्रांद तथा 3 बसपा के विधायकों के समर्थन से स्पष्ट बहुमत 36 से 3 अधिक यानी 39 जुटा कर सरकार बना दिया। परन्तु जेसे ही काफी कसमकस के बाद कांग्रेस आला नेतृत्व ने प्रदेश की राजनीति में कम असरदार सांसद विजय बहुगुणा को प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में ऐलान किया वेसे ही कांग्रेस में मुख्यमंत्री के प्रदेश के सबसे मजबूत दावेदार हरीश रावत व उनके समर्थक विधायक विद्रोह पर उतर गये। हालांकि हरीश रावत के बाद सबसे मजबूत जननेता सतपाल महाराज व उनके एक दर्जन के करीब विधायकों के समर्थन के कारण जेसे तेसे विजय बहुगुणा ने शपथ ग्रहण समारोह किया। इसमें साफ हो गया कि अधिसंख्यक विधायकों का समर्थन विजय बहुगुणा के पक्ष में नहीं है। क्योंकि डेढ़ दर्जन से अधिक विधायक हरीश रावत के समर्थन बताये गये। जो समर्थन भी कर रहे हैं वे या तो गैर कांग्रेसी विधायक व सतपाल महाराज गुट के एक दर्जन विधायक है। हालांकि विधानसभा में शपथ ग्रहण करने के दिन भी 18 विधायकों ने शपथ नहीं ली तो विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाने की कांग्रेस आला कमान का निर्णय जनता की आंखों के आगे सरेआम बेनकाब हो गया। इस निर्णय से साफ हो गया कि कांग्रेस आला नेतृत्व को न तो प्रदेश कांग्रेस की व नहीं अपने अधिसंख्यक विधायकों के भावों का सम्मान तक करना आता है।
इस कांग्रेसी उठापटक पर बहुत ही मुश्किल से विजय बहुगुणा को पार पाने में सफलता मिली। किसी तरह से विधायकों को शपथ के साथ बडे खिदमत करके हरीश रावत के समर्थक गोविन्दसिंह कुंजवाल को विधानसभा अध्यक्ष और महेन्द्रसिंह महरा को राज्य सभा का सांसद बनाने की तमाम कसमें वादे निभाये गये। परन्तु अपनी कुर्सी के खातिर हरीश रावत की एक एक बाते मानते देख कर, प्रदेश में अन्य क्षत्रपों खासकर सतपाल महाराज गुट में ही नहीं यशपाल आर्य को भी बैचेनी होने लगी। बैचेनी का कारण भी जिस प्रकार से मुख्यमंत्री बहुगुणा एक के बाद एक मांगे हरीश गुट की मांग रहे थे, उससे उनको इस मांग से भी भय सताने लगा कि कहीं प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर हरीश रावत के सबसे तेजतरार सिपाहेसलार सांसद प्रदीप टम्टा को न बना दे। इसी कारण सतपाल महाराज गुट ने ही नहीं अपितु यशपाल आर्य ने भी विजय बहुगुणा को अपनी त्योरियां दिखानी शुरू कर दी।  इन कई गुटों में बंटी कांग्रेस के आपसी द्वंद ने न केवल प्रदेश में कांग्रेस की छवि तार तार कर दी अपितु प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को भी एक असहाय व कमजोर मुख्यमंत्री के रूप में लोगों व नौकरशाहो के जेहन में बसा दिया है।
शायद इसी छवि को तोड़ने के लिए मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने इस प्रकार के लोक लुभावने कदम उठाये है। मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को एक तरफ गुटबाजी में बुरी तरह से बंटी कांग्रेस की दलदल से खुद को निकालना हैं अपितु उनको अपने मंत्रियों के आपसी गुटों के द्वंद से सरकार की सामुहिक भागेदारी को भी बचाना है। गुटबाजी में बंटी कांग्रेस की हालत आज प्रदेश की जनता के सामने इतनी बदरंग हो गयी कि अगर आज के दिन में प्रदेश में फिर से विधानसभा चुनाव हो जायें तो कांग्रेस को दहाई का अंक जुटाने के लिए भी लाले पड़ जायेंगे। इन तमाम टोटकों के सहारे मुख्यमंत्री अपने जल्द ही आम आदमी से न घुल मिल सकने वाले व्यवहार के कारण अपनी इस बनायी हुई छवि के बदोलत कहां तक प्रदेश की जनता का दिल जीत पाते हैं यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। परन्तु इतना निश्चित हैं कि इसका फेसला तो बाद में होगा इससे पहले मुख्यमंत्री को अपनी विधायकी पर ही जनता की मोहर लगानी है। इसके लिए उनके पास सबसे बड़ी चुनौती हैं कि वे पर्वतीय क्षेत्र से चुनाव लड़ते हैं या अपने ही संसदीय क्षेत्र के तहत देहरादून की किसी सीट से चुनाव लडते है। आज के दिन प्रदेश की राजनैतिक माहौल को देख कर साफ लगता हैं कि ंमुख्यमंत्री तो रहा दूर किसी भी कांग्रेसियों के लिए विधानसभा की कोई भी सीट जीतना एक टेड़ी खीर साबित होगी। प्रदेश की लोकशाही से जो खिलवाड़ भाजपा के बाद कांग्रेसी आला कमान ने किया उसका मुंहतोड़ जवाब प्रदेश की जनता तो अवश्य देगी। इसी आश में कि प्रदेश की जनता एक बार फिर पूरे देश को यह बताने का शुभ अवसर अपने हाथों से नहीं गंवाना चाहेगी कि उत्तराखण्ड की लोकशाही से सत्तामद में खिलवाड़ करने वालों को जनता किसी भी कीमत पर माफ नहीं करती। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।

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