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Saturday, April 28, 2012


-जब नेहरू के घर में आयी मुझे जिन्ना व नेहरू की याद

-नेहरू जी के दिल्ली स्थित तीन मूर्ति आवास में 


कल यानी 28 अप्रैल को सूर्य अपनी दैनिक यात्रा के अंतिम पडाव की तरफ था मैं भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के निवास रहे तीन मूर्ति भवन में नेहरू जी की स्मृर्तियों को जीवंत कर रहा था। वहां मै वहां देश के वरिष्ट पत्रकार मित्र विजेन्द्र सिंह रावत व डाक्टर जोशी जी के साथ दिल्ली में 35 साल रहने के बाबजूद कभी न तो नेहरू तारामण्डल में ही गया व नहीं इसके साथ सटे नेहरू जी के आवास रहे तीन मूर्ति रूपि विशाल भवन में गया था। वहां कल डा. जोशी के अनुराध पर संयोगवश अल्पाहार ग्रहण करने के लिए गया था। वहां के सुन्दर हरे भरे  मनोहारी वातावरण में मुझे नेहरू जी की यादें ताजा हो गयी। मेने इस अनुभूति को अपने दोनों मित्रों से भी प्रकट की।
मैं वहां की मनोहारी सौन्दर्य का आनन्द लेने के बजाय मेरे सामने भारत के महान स्वप्न दृष्टा व लोकतांत्रिक देश भारत को बनाने वाले कुशल शिल्पी नेहरू का विराट व्यक्तित्व उभरने लगा। हालांकि नेहरू से अधिक मुझे देश के अब तक के प्रधानमंत्रियों में से इंदिरा गांधी को मजबूत व कुशल प्रधानमंत्री मानता हॅू। पर यहां पर बात हो रही है नेहरू जी के विराट व्यक्तित्व की। नेहरू बनाम मोहम्मद जिन्ना, हिन्दुस्तान के इन दो बडे नेताओं ने 1947 के बाद हिन्दुस्तान के विभाजन के बाद बने भारत व पाकिस्तान नामक देशों का नेतृत्व किया। नेहरू जी से वैचारिक रूप से कई मुद्दों पर मतभेद हो सकते हैं परन्तु उनकी राष्ट्र की मजबूत नींव रखी। यहां पर बडे बडे सरकारी क्षेत्र के उद्यम स्थापित किये। यहां पर ऐसा शासन प्रशासन दिया कि उसका हाल पाकिस्तान की तरह लोकशाही का गलाघोंट कर फोजी तानाशाही की जकड़ में जीने का कलंक तक नहीं लगा। जो लोग आज भारत की हर समस्या के लिए नेहरू को पानी पी पी कर कोसते हैं उनको नेहरू के वैज्ञानिक व आधुनिक विकास की मजबूत सोच को जमीनी धरातल में स्थापित करने वाले लोकतांत्रिक देश भारत के समक्ष  पाकिस्तान को समाने रख कर तुलनात्मक विवेचन करना चाहिए। मेरा कश्मीर, भारतीय संस्कृति व भाषा आदि अनैक विषयों में नेहरू जी से वैचारिक मतभेद होने के बाबजूद मेरा मानना है कि पाकिस्तान की तुलना भारत इस लिए शौभाग्यशाली रहा कि उसका नेतृत्व नेहरू जैसे प्रगतिशील व्यक्ति के पास रहा । वहीं पाकिस्तान का दुर्भाग्य रहा कि उसका नेतृत्व जीना जैसे स्वार्थी व्यक्ति के पास रहा। क्योंकि सिद्धांत रूप में जीना पाकिस्तान का समर्थक नहीं था, वह केवल प्रधानमंत्री बनने की अंधी ललक में देश के विभाजन करने को न केवल तुला अपितु हिन्दुस्तान के दसों लाख लोगों के कत्लेआम का सबसे बड़ा गुनाहगार भी रहा। भले ही आडवाणी सहित कई नेता दलीय स्वार्थ के कारण आज जिन्ना भक्ति की चालिसा पढ़ते हों परन्तु इस सच को विश्व में कोई नहीं झुटला सकता है कि नेहरू द्वारा नींव रखे गये देश, भारत आज विश्व की एक मजबूत सामरिक व आर्थिक शक्ति बन कर अपना तिरंगा फहरा रहा है। वहीं मोहम्मद जिन्ना द्वारा नीव रखे गये देश, पाकिस्तान आज विश्व का सबसे बडा आतंकी व टूटने के कगार पर बीमार देश के रूप में विश्व शांति को  कलंकित कर रहा है। मैं नेहरू जी का अंध भक्त नहीं, परन्तु एक तटस्थ दृष्टि से नजर दौडाता हॅू तो वे एक बेहतर इंसान थे, जिसके पास उस समय संसार में भोग विलाश के अधिकांश साधन जिनके लिए भारत का मध्यम वर्ग भी आज भी तरस रहा है, के होने के बाबजूद वे देश की आजादी के जंग में कूदे थे। अनेक जेल यात्राये की थी। हाॅं उनकी जो सोच हे वह उनके पिता द्वारा उनको प्रदान किया गया परिवेश जिम्मेदार है। उनके पिता उनको भारतीय संस्कृति के पालक की तरह नहीं फिरंगी लाट साहबों की तरह पालन पोषण कर उनको भी लाट साहब बनाना चाहते थे। महात्मा गांधी पर भारतीय संस्कृति की अमिट छाप ताउम्र दिखी, उसमें उनकी माता जी द्वारा उनको बचपन में दिये गये संस्कार रहे।  जेसे गोविन्द बल्लभ पंत ने केसी पंत व हेमवती नन्दन बहुगुणा ने विजय बहुगुणा का पालन पोषण किया। इसी जरूरत से ज्यादा लाड़ प्यार के कारण आज केसी पंत ही नहीं विजय बहुगुणा चाह कर भी आम आदमी के साथ घुलमिल नहीं पाते है। आज इसी कारण के सी पंत व विजय बहुगुणा देश की जनता के साथ तो रहा दूर अपने समाज के अपने चाहने वालों से सहज रूप से घुल मिल नहीं सकते हे। वहीं नेहरू जी तमाम लाट साहब की तरह लालन पालन होने के बाबजूद जननेता व आम जनता से घुलमिलने वाले नेता रहे।
नेहरू जी द्वारा राष्ट्र को समर्पित किये गये इस तीन मूर्ति आवास में आधा घण्टे से कम व्यतीत किया गया समय की स्मृतियां अपने साथियों को जिस रूप में मैने प्रकट की वे विचार कई सालों से मेरे मन मस्तिष्क में क्रांेध रहे थे। भारत मे ंउस समय नेहरू व जिन्न ा के समान ही कई बडे नेता थे, जिनके विचार व कार्य किसी भी हालत में नेहरू व जिन्ना से कमतर नहीं थे, परन्तु जो सत्तासीन हुए उनकी तुलनात्मक हल्का सा विवेचन मेरे मन में उमडा। वैसे उस समय नेता जी सुभाष चन्द्र बोस, सरदार पटेल आदि कई वरिष्ट नेता थे। परन्तु इतिहास उसी की तुलना करता है जो मैदान में उतर कर अपने खेल का प्रदर्शन करने का अवसर पाता है।

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