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Thursday, April 5, 2012

हुक्मरान नहीं सुधरे तो कभी भी लग सकता है लोकशाही पर ग्रहण !


हुक्मरान नहीं सुधरे तो कभी भी लग सकता है लोकशाही पर ग्रहण !
सेना ही नहीं आम आदमी भी दुखी है देश के कुशासकों द्वारा की जा रही देश की बर्बादी से /
‘सेना का दिल्ली कूच ’की खबर ने देश के हुक्मरानों की ही नहीं पूरे देश में कंपकपी फेला दी है। भले ही सरकार व सेना इंडियन एक्सप्रेस की इन खबरों को कोरी बकवास बता कर निंदा कर सिरे से खारिज कर दे ं कि 16 जनवरी 2012 की रात को  सेना की दो टूकडियां हरियाणा के हिसार व उप्र के आगरा से दिल्ली की तरफ पूरे लाव लक्सर के साथ कूच करी थी, दिल्ली के नजदीक पंहुचने पर इनको वापस भेज दिया गया। वहीं अखबार का कहना है कि यह रक्षा मंत्रालय की जानकारी के बिना सबकुछ हुआ और उसी दिन न्यायालय में जनरल वी के सिंह की जन्म विवाद का भी मामले की सुनवाई थी।  सेना इसे अपना सामान्य अभ्यास बता कर इस खबर पर ही प्रश्न चिन्ह लगा रही है। जो भी हो वहीं द संडे गार्जियन नामक अखबार का दावा है कि इस खबर के पीछे केन्द्र सरकार के किसी वरिष्ठ मंत्री का ही हाथ है। इस खबरे से पूरे देश में एक प्रकार की सनसनी फेल गयी। परन्तु यह बात सच है जिस प्रकार से विगत डेढ़ दशक से देश की सरकारें जनहितों को निर्ममता से रौंद रही है उससे सेना ही नहीं आम देशभक्त आदमी काफी आहत है। यह आज भले ही सच हो कि सेना का इस प्रकार का कदम नहीं उठाया, परन्तु अगर हालात इसी प्रकार से बद से बदतर रहे और देश के हुक्मरान देश को दोनों हाथों से लुटने व लुटाने से बाज नहीं आये तो इस प्रकार की घटनायें भविष्य में कभी नहीं होगी इसका दावा कोई नहीं कर सकता है। क्योंकि कुशासकों द्वारा देश को जिस प्रकार से पतन के गर्त में धकेला जा रहा है उससे प्रत्येक राष्ट्रभक्त चाहे वह सेना में हो या आम नागरिक बहुत ही उद्देलित है। देश की हो रही बर्बादी को मूक रह कर कब तक देश की जनता देखेगी। देश की वर्तमान हालत कितनी भयानक हैं । भारतीय सेना संसार में सबसे लोकशाही का सम्मान करने वाली अनुशाशित सेना मानी जाती हैं वहीं पाकिस्तानी सेना संसार की सबसे अधिक लोकशाही का दमन करने वाली सेना मानी जाती रही है। यहां इस बात का उल्लेख करना भी इस विषय को समझने में हितकर होगा कि देश के हुक्मरानों के कुशासन से व्यथित हो कर कई बार देश के बीजू पटनायक जेसे जमीनी नेता भी देश की सेनाओं से सीधे हस्तक्षेप की पुरजोर मांग करते रहे।
इसके बाबजूद देश की सेना ने जो अनुशासन व धैर्य दिखाया वह पूरे विश्व की लोकशाही के लिए अनुकरणीय है। इसके साथ ही यहां पर वर्तमान हालातों को नजरांदाज करके इस विषय को हवा में नहीं उडाया जा सकता है। देश में लोकशाही के अब तक के इतिहास में सेना प्रमुख व सरकार के बीच इस प्रकार की कई विषयों को लेकर इतनी असहज स्थिति कभी नहीं रही। इसी कारण इन खबरों में भले ही सच्चाई न हो  पर भारतीय लोकशाही को आत्मनिरीक्षण करने वाला अवसर अवश्य मानी जा सकता है। यह इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि अगर देश के हुकमरान देश को अपने कुशासन से इसी प्रकार रसातल में धकेल कर रौंदते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब कभी भी भविष्य में यह आशंका सच में साकार हो कर देश की लोकशाही पर पाकिस्तान की तरह ग्रहण लगा दे।
आज देश की आम जनता का मंहगाई, भ्रष्टाचार, आतंकवाद से जीना ही दूश्वार हो रखा है। आम गरीब आदमी से शिक्षा, चिकित्सा, न्याय व सम्मान पंहुच से बाहर हो गया है। ऐसे में देश में आम आदमियों की हालत को सुधार करने की काम के बजाय देश के हुक्मरान, नौकरशाह एक प्रकार से एक के बाद एक भ्रष्टाचार में आये दिन लिप्त होते जा रहे है। इससे आम आदमी का विश्वास देश के हुक्मरानों से इस कदर उखड गया कि वह अच्छे राजनेताओं से भी किनारे करने लगे है। यह देश की लोकशाही के लिए कोई शुभ लक्षण नहीं है।  देश के हुक्मरानों को देश की आम जनता की हितों की रक्षा करनी चाहिए ताकि उनका विश्वास देश की लोकशाही में बना रहे। अगर इस प्रकरण से देश के हुक्मरानों ने आत्म निरीक्षण नहीं किया तो आने वाले समय में कभी भी देश की लोकशाही पर ग्रहण लग सकता है। आज सवाल यह नहीं रहा कि 16 जनवरी को सेना की जिन टुकडियों ने दिल्ली कूच किया वह देश की लोकशाही पर ग्रहण करने के लिए था या सामान्य सेना का अभ्यास मात्र था। सवाल यह है कि इस प्रकार की परिस्थितियां क्या देश में उत्पन्न हो चूकी है कि जिससे संसार की सबसे अनुशासित समझी जाने वाली सेना का भी धेर्य डगमगा रहा है? आज केवल कुशासन ही नहीं सेना को ही नहीं देश के आम राष्ट्रभक्त नागरिक को उद्देल्लित करने वाली जो बातें हैं वह क्यों सरकार देशद्रोहियों को दण्डित करने में असहाय नजर आ रही है। क्यों सरकार संसद व मुम्बई पर हमले करने वाले देशद्रोही को न्यायालय द्वारा फांसी की सजा पर मुहर लगाने के बाबजूद फांसी देने के बजाय उसको पाल पोष रही है। आखिर संसस से लेकर मुम्बई ही नहीं देश की सीमाओं की रक्षा में अपनी जान की बाजी लगा कर भी जिन आतंकियों को मार व पकड़ कर सैनिक देश की एकता व अखण्डता की रक्षा करते हैं, उन आतंकियों को न्यायिक दण्ड मिलने के बाबजूद भी देश के हुक्मरान उनको यथाशीघ्र दण्डित करने के बजाय उनको नपुंसकों की तरह शर्मनाक संरक्षण देती है तो तमाम देशभक्तों के सीने में बज्रपात से कम नहीं होता। देश भक्त सैनिक अपने आप से यहीं प्रश्न करते हुए स्वयं को ठगा महसूस करता है कि आखिर उनके बलिदान का क्या यही हस्र है? देश के हुक्मरानों को इस प्रकरण से सबक लेना होगा कि देश के प्रति उनका क्या दायित्व हैं। जब तक नेताओं को देश व आम जनता के हितों की पूर्ति के लिए अपने दायित्व का बोध नहीं होगा तब तक आम जनता को वर्तमान व्यवस्था पर कोई विश्वास नहीं होगा।
यही जनविश्वास ही लोकशाही के प्राण होते है। परन्तु दुर्भाग्य इस देश का यह है कि नाम के लिए भले ही देश में देश की राजसत्ता की बंदरबांट करने के लिए कई पार्टिया हैं जो जाति, धर्म, क्षेत्र आदि के नाम पर अपनी राजनीति करते हों परन्तु देश के प्रति अपने दायित्वों की उपेक्षा करने के लिए सभी दल एक से है। इस लिए जरूरत है देश की लोकशाही के प्रति देश के राजनेताओं व नौकरशाहों के साथ साथ आम जनता का भी नजरिया बदले की। आज जो आधी अधूरी लडाई लड़ने वाले बाबा रामदेव व अण्णा हजारे जैसे समाजसेवियों के साथ जो जन शैलाब उमड़ रहा है वह काफी हद तक देश की आम जनमानस का देश की वर्तमान व्यवस्था से मोहभंग होने के बाद जनाक्रोश का ही स्पष्ट संकेत भर है। अगर देश के हुक्मरानों ने देश की आम जनता की हितों की उपेक्षा इसी तरह जारी रखी तो कभी भी यह जनाक्रोश का संकेत भी जनाक्रोश में बदल कर वर्तमान व्यवस्था पर ही ग्रहण लगा सकता है। जरूरत है इसी दिन से बचने व देश की वर्तमान व्यवस्था को सुधारने की, जिससे लोकशाही पर ग्रहण नहीं मजबूती प्रदान हो। शेष श्रीकृष्ण।  हरि औम तत्सत्। जय श्री कृष्णाय् नमो।

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