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Friday, April 20, 2012


गांधी को गाली देने से नहीं बनेगा भारत महान

रात की बात न कर, रात तो गुजर गयी,
ऐ सुबह मुझे बता, तेरी रोशनी कहां गयी।।

अनाम शायर की उक्त पंक्तियां मेरे उन सभी साथियों के लिए है जो देश की समस्याओं का ईमानदारी से समाधान खोजने के बजाय केवल बीते जमाने के नेताओं, महापुरूषों व हुक्मरानों को कोसते है। देश में एक बड़ा वर्ग है जो भारत की बदहाली के लिए गांधी व उनके विरासत के वाहक नेहरू को जिम्मेदार मानते है। मैं नहीं कहता कि यह सही है या नहीं। मैं मानता हॅू कि कोई भी भूत चाहे कितना भी बडा हो वह वर्तमान से बड़ा नहीं हो सकता। आज भारत का दुर्भाग्य यह है कि जिन लोगों का समाजसेवा व चरित्र नाम की कोई चीज खुद भी न हो वे लोग भी बेशर्मी से गांधी को गाली दे कर खुद को बडे देशभक्त साबित करते है। हम वर्तमान हैं हमारा दायित्व है वर्तमान को संवारने व समाधान करने का। हम अपनी पूरी पीढी इसी निदंा में भी खपा दें तो भी इसका समाधान नहीं निकलेगा। हमे तो समस्या को पहचान कर उसका पूरी ईमानदारी से समाधान करना चाहिए। यह सही है कि जो समस्या का निदान प्रारम्भिक स्थिति में हो सकता था वह समाधान करने में आज काफी परेशानी उठानी पड़ सकती है।
गांधी महान थे या नहीं, आज इससे किसी समस्या का समाधान होने वाला नहीं। वर्तमान की समस्याओं का समाधान देश के वर्तमान जनता व देशवासियों को ही करना होगा। गांधी भगवान कृष्ण या भगवान राम नहीं जिनका आंख बंद कर अनुशरण किया जाय। गांधी जी आम इंसानों की तरह एक इन्सान ही थे, गलती इन्सानों से होती है। गांधी जी से भी कई गलतियां हो गयी होगी। परन्तु आज संसार के 200 सालों के इतिहास में पूरे विश्व के जनमानस को जिसने अपने विचारों व आंदोलन से प्रभावित किया उसमें भारत के महानायक महात्मा गांधी ही है। आज अफ्रीका का लोकशाही आंदोलन के महानायक मंडेला हो  या अमेरिकी लोकशाही के पुरोधा मार्टिन लूथर किंग या अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति ओबामा या महान वैज्ञानिक आईस्टिन आदि। महात्मा गांधी में कई ऐसे चमत्कृत करने वाले विचार व कार्य थे जो आज भी पूरे विश्व का दिशा दे रही है। गांधी महामानव भी थे, उनके कई गुणों के आगे आज के नेता कहीं नहीं टिकते। जिस प्रखरता से गांधी अपने सिद्धांतों व कमियों को स्वीकारते वैसा करने का साहस आज कितने महापुरूषों को हैं, यह आप सभी जानते है। परन्तु इतना सच है जितना करीब से गांधी जी ने भारत को समझा वेसा आज के लोगों ने भी नहीं समझा। मैं नाथूराम गोडसे की पीड़ा को समझ सकता हॅू। मेने गांधी बध और मैं नामक पुस्तक भी पढ़ी। मुझे नाथू राम गोडसे के छोटे भाई गोपाल गोडसे से संक्षिप्त सी मुलाकात हुई। हिन्दु महासभा दिल्ली के एक कमरे में, मैं वहां पर भारतीय भाषा आंदोलन के पुरोधा व संघ लोकसेवा आयोग पर विश्व विख्यात आंदोलन करने वाले अखिल भारतीय भाषा संरक्षण संगठन के महासचिव स्व. राजकरण सिंह के साथ मिला था, उस समय राजकरण सिंह जी ने मेरा परिचय उत्तराखण्ड राज्य आंदोलनकारी के तौर पर भी गोपाल गोड़से से कराया, उस पर गोपाल गोडसे ने कहा कि वे छोटे राज्यों के पक्षधर नहीं हैं और अखण्ड भारत के पक्षधर हैं। परन्तु मैने उनको कहा कि उत्तराखण्ड राज्य गठन आंदोलन पूरी तरह से राष्ट्रवादी आंदोलन है उसको अलगाववादी मानना एक प्रकार भी हिमालयी भूल है।
पर मेरा साफ मानना है गांधी जी की हत्या नाथूराम गोडसे ने नहीं अपितु आजाद भारत की अब तक की तमाम सरकारों ने की। नाथू राम ने तो गांधी के शरीर यानी करमचंद मोहनदास गांधी की हत्या की थी, परन्तु गांधी जी जिनको पूरा देश मानता था, वह व्यक्ति ही नहीं एक सिद्धांतों का शक्तिपूूॅज था, जिसे देश की जनता महात्मा गांधी के रूप में मानती थी। गांधी जी के सिद्धातों खासकर भारतीय संस्कृति, भाषा, शराब, गो हत्या, कुटीर उद्योग, ग्रामीण जगत के प्रति गांधी जी का स्पष्ट सोच थी। उस सोच का गला जो देश के हुक्मरानों ने घोंटा वह गांधी जी के सपनों के भारत की ही निर्मम हत्या है नहीं थी अपितु यह गांधी जी की भी हत्या मानी जा सकती है। परन्तु हमें यह याद रखना होगा कि गांधी किसी राजा महाराजा की संतान नहीं थी, जो वे यकायक देश में महानायक बन गये। ना ही गांधी जी के आजादी के आंदोलन में कूदने से पहले भारतीय जनमानस को इस दिशा में आंदोलित करने में नेताओं की कोई कमी नहीं थी। गांधी जी से पहले कई अग्रणी नेता इस देश को आंदोलित करने में लगे थे। परन्तु गांधी ने अपनी कथनी व करनी में देश की आम जनमानस को इतना उद्देलित कर दिया कि गुलामी की जंजीरों में शताब्दियों से दबे हुए भारतीय जनमानस ने गांधी जी के सत्य अहिंसा आंदोलन को अंगीकार करके फिरंगी हुकुमत को ही नहीं पूरे विश्व को झकझोर कर रख दिया। गांधी को गाली देना या उनमें कमियां निकालना आसान है परन्तु उनकी तरह देश के आम जनमानस को उद्देल्लित करने वाले आजाद भारत में कितने नेता है। आज तो देश में आजाद भारत की हुक्मरान हैं इसके बाबजूद देश के कुशासन के खिलाफ क्यों देश के आम नेताओं व जनता संड़कों पर उतरने से कोई नेता क्यों नहीं रहुनुमा बन रहे हैे। आज सबसे जरूरत है अपनी जिम्मेदारी समझते हुए देश को तबाह कर रहे राजनेताओं, नौकरशाहों, बाबाओं, समाजसेवियों व उद्यमियों की जकड़ से बचाने के लिए सडकों पर उतने का। जो भी इंसान होगा वह किसी भी इंसान से घृणा करने की सीख दे ही नहीं सकता। वह जाति, धर्म, क्षेत्र, लिंग व भाषा के नाम पर बेगुनाह लोगों का शोषण, कत्ल या दमन करने की सहमति दे ही नही सकता।
गांधी ही शतः प्रतिशतः सही है ऐसा भी मैं नहीं समझता, भारतीय आजादी की जंग में हजारों महानायकों ने भी अपनी अपनी तरह से महान योगदान दिया। महानक्रांति वीर सावरकर, शहीद ऊधमसिंह,  महान शहीद भगतसिंह, चन्द्रशेखर आजाद, सुभाष चन्द्र बोस सहित असंख्य हुत्मात्माओं के योगदान को किसी भी सूरत में कम कर नहीं आंका जा सकता है। परन्तु गांधी ने भारतीय जनमानस के अंदर से जो गुलामी का भूत भगा कर उनको आजादी के आंदोलन में एकसुत्र में पिरोकर एक भारतीय बन कर संघर्ष में उतारा उस महान योगदान को भूलाने की कुचैष्ठा करने वाले खुद कहां खड़े हे। आज जरूरत है देश को बचाने के लिए गांधी की तरह खुद को देश हित के लिए समर्पित करके पूरे देश की जनता को जागृत करने की। शेष श्रीकृष्ण कृपा। हरि ओम तत्सत्। श्रीकृष्णाय् नमो।

   
   

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